Search

Omi Tales

The Chases Of Mirage

Tag

childhood

आज बिका हूँ मेलों में गुब्बारों की तरह

 

आज बिका  हूँ मेलों में गुब्बारों की तरह

कुछ देर तक बंधा था खिलौने  वाले की छड़ी से

फिर किसी बच्चे ने जिद् की

और मैं आ गया किसी की हथेलियों में खुशियों की तरह।

आज बिका हूँ मेलों  में गुब्बारों की तरह।

 

कुछ देर रहा में उस नन्ही हथेलियों में

मेले के भीड़ में कई कन्धों से टकराया मैं,

मैं कही फुट न जाऊँ

उस बच्चे ने करीब कर लिया अपने दिल के

किसी बच्चे की माँ की तरह।

आज फिर बिका हूँ मैले में गुब्बारों की तरह।।

 

भीड़ में छूट गया धागा हाथों से

मैं उड़ चला बेहद धीरे धीरे आसमान में

अब सबने मुझे देखा सर उठा के

जैसे कोई मैं आसमान में घूम रहा हूँ टूटे तारे की तरह।

आज फिर बिका हूँ बाज़ार में किसी गुबारे की तरह।।

 

कुछ देर उडा  मैं,

कुछ दूर उड़ा  मैं

जब देखा मेरे यार का महोल्ला ऊपर से तो धीमा हो गया

किसी आशिक की मोटर साईकिल की तरह।

 

::ओमी यादव::

 

Advertisements

स्कूल का बस्ता

वो स्कूल का बस्ता
वही दो चिटकनी वाला स्कूल का बस्ता।

रोज सुबह भर के किताबे चल देते थे स्कूल
जिसकी हालत को देख माँ कहती थी कचरा।
हाँ वही दो चिटकनी वाला बस्ता।।

जिस बस्ते के ऊपर एक ज्योमेट्री बॉक्स रहती थी,
दो अलग से खटाल थे जिसमे हम रखते थे लंच बॉक्स और डायरी।
जब हम चलते थे, ज्योमेट्री बॉक्स बजते थे,
अब याद आया वो बस्ता?
अरे वही दौ चिटकनी वाला बस्ता,

अब हुई जब छुट्टी
चुपके से रास्ते में खोल दी दोस्त के बस्ते की चिटकनी,
हा हा हा कर के हम भागे थे और वो
संभालता रह गया वो बस्ता
सो चिटकनी वाला बस्ता।

बचपन की खुशियाँ

हम भूलते गए वो बचपन की खुशियाँ
जो मिलती थी हमें छुट्टियों में नानी के घर पे,
दोस्तों के कन्धों पे लटके हुए बस्ते की
चिटकनी खोलके,
पेंसिल को दोनों तरफ छिलने पे,
हम भूलते गए वो बचपन की खुशियाँ

हम भूलते गए वो खुशियाँ जो आती थी
चेहरे पे सर्दी खत्म होने के बाद
चलते हुए पंखे के धुल के साथ

हम भूलते गए वो बचपन की खुशियाँ
जो मिलती थी हमे अपने जुराब घुटनो तक पहनने पे
हम भूलते गए वो बचपन की खुशिया

 

 

 

Blog at WordPress.com.

Up ↑