Search

Omi Tales

The Chases Of Mirage

बेवजह परेशान है दिल

यूँ बेवजह परेशान है दिल,
क्या रात क्या दिन।
धड़कनो की दौड़ तेज़ है
न जाने कहाँ जाना चाहता है ये दिल।।

मेरी इन काली घेरे वाली आँखों को इश्तेहार बनाया है तेरा,
इस इश्तेहार को दिखा के पूछ रहा हूँ तेरा पता।
पहले दुनियां में सबसे अलग लगती थी,
पर अब हर चहरे में तुझको खोज रहा है ये दिल।
क्यों बेवजह परेशान है दिल,
क्या रात क्या दिन।।

Advertisements

आँखों की गहराई खूब है

उनकी आँखों की गहराई खूब है,
की डूब जाने का डर है।
मैं रहता हूँ बस उनके ख्यालों में
की अब तो खाली घर है।।

हमने मिलानी चाही उनसे नज़रे
पर दिल के खो जाने का डर है।
उनकी आखों की गहराई खूब है,
की डूब जाने का डर है।।

आँखों में कुछ बस्तियाँ बसी है लगता है,
कुछ खुशियों की चमक, कुछ चंचल शर्म है,
उनकी भी आँखे मुझे ही देखती है,
यह सच है या मेरा वहम है ।
उनको पाने की कोशिश नही करता,
क्योंकि  खो देने का डर है।
उनकी आँखों की गहराई खूब है,
की डूब जाने का डर है।।

ऐ हवा कुछ दूर तो चल

ऐ हवा कुछ दूर तो चल
कुछ देर तो चल।

जो लड़की आ रही है इस तरफ
अपने चहरे को ज़ुल्फ़ों से ढके
तू उसके पास से निकल
उडा दे उसकी लटें और आँचल,

ऐ हवा कुछ दूर तो चल,
कुछ देर तो चल।

मैने जो पत्थर फेका पानी में
कुछ तरंगें बनी है उस से
पर लगता नही की वो काबिल है
उस कागज़ के नाव को उस पार ले जाने में,
ऐ हवा मेरा एक काम तो कर
इस नाव को उस पार ले चल,

ऐ हवा कुछ दूर तो चल,
कुछ देर तो चल।

अब तुझे मैंने ये काम दिया ही है
तो बता दूँ कि नाव पे कुछ लिखा है मैंने
जो उस पार बैठा है उसके लिए,
तो गुजारिश है तुझसे की धीरे चल।

ऐ हवा कुछ दूर तो चल,
कुछ देर तो चल।

बेसब्र सी है आँखें क्योंकि

बेसब्र सी है आँखें मेरी,
की न देखा तुझे अरसो से।

धून्धली सी तस्वीर तेरी
की मिट न जाये मेरी यादों से।
फिर दिखा जा अपने चहरे को,
जो न देखा मेने बरसो से,

बेसब्र सी है आँखें मेरी,
की न देखा तुझे अरसो से।

यूँ तो उतारता रहता हूँ तेरा चहरा
यादों में झांक-झांक के,
मैं सहमां हूँ इस तस्वीर में कुछ कमी देख के,
आ स्पर्श कर जा मेरी यादें अपने उँगलियों से,
जो मेंरे बालों में फेरी नही तूने बरसो से,

बेसब्र है आँखें में मेरी,
की न देखा तुझे अरसो से।

स्कूल का बस्ता

वो स्कूल का बस्ता
वही दो चिटकनी वाला स्कूल का बस्ता।

रोज सुबह भर के किताबे चल देते थे स्कूल
जिसकी हालत को देख माँ कहती थी कचरा।
हाँ वही दो चिटकनी वाला बस्ता।।

जिस बस्ते के ऊपर एक ज्योमेट्री बॉक्स रहती थी,
दो अलग से खटाल थे जिसमे हम रखते थे लंच बॉक्स और डायरी।
जब हम चलते थे, ज्योमेट्री बॉक्स बजते थे,
अब याद आया वो बस्ता?
अरे वही दौ चिटकनी वाला बस्ता,

अब हुई जब छुट्टी
चुपके से रास्ते में खोल दी दोस्त के बस्ते की चिटकनी,
हा हा हा कर के हम भागे थे और वो
संभालता रह गया वो बस्ता
सो चिटकनी वाला बस्ता।

बचपन की खुशियाँ

हम भूलते गए वो बचपन की खुशियाँ
जो मिलती थी हमें छुट्टियों में नानी के घर पे,
दोस्तों के कन्धों पे लटके हुए बस्ते की
चिटकनी खोलके,
पेंसिल को दोनों तरफ छिलने पे,
हम भूलते गए वो बचपन की खुशियाँ

हम भूलते गए वो खुशियाँ जो आती थी
चेहरे पे सर्दी खत्म होने के बाद
चलते हुए पंखे के धुल के साथ

हम भूलते गए वो बचपन की खुशियाँ
जो मिलती थी हमे अपने जुराब घुटनो तक पहनने पे
हम भूलते गए वो बचपन की खुशिया

 

 

 

इंतज़ार है तेरा इस कोफ़ी के खत्म होने तक का,
तुझे भूलने का वादा किया था पर इंतज़ार कर रहा हूँ इस बात के दोहराने तक का,
इंतज़ार है तेरा इस कोफ़ी के खत्म होने तक का।।

image

रंगत तो वैसी ही है तेरे शहर की बस तेरी इत्र की महक खोई सी है,
बस उसी महक का इंतज़ार है मेरे सब्र के खत्म होने तक का।
इंतज़ार है तेरा इस कोफ़ी के ख़त्म होने तक का।।

कैसा हूँ मैं।

मै कौन हूँ ये नहीं है जरूरी ,
मैंने क्या है पाया
मेरा रंग कैसा है !

मै कैसा हूँ
मै सोचता क्या हूँ
मेरे पास कितना पैसा है !

इन सवालों में ना जायें
की ये किसी फ़िल्म के
विलेन जैसा है !

डिग्री है कितनी
पढ़ाई क्या की
सवाल तो गंवारों जैसा है !

तेरा नाम क्या
कहा से आया
अभी तक क्या-क्या कमाया !

तुम्हारी शादी हुयी की नहीं
ये सभी सवाल तो
चाहने वालो जैसा है !

मै तो शक्ल से काला
बिलकुल काला
काली भैस जैसा हूँ !

अक्ल से तो अल्हड़
मुर्ख और नकचिढ़ा
बिलकुल बैल जैसा हूँ !

डिग्री है पाई मैंने
मुर्ख , भोंदू , अल्हड़
और भी बहूत सारे !

लेकिन कमाई में तो
कुबेर जैसा हूँ !
मेरे लिए तो
कविता , काव्य
और कवि  !
ये सभी एक सुन्दर
परिवार जैसा है !

Blog at WordPress.com.

Up ↑